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आर्य समाज की स्थापना | arya samaj ki sthapna kisne ki

आर्य समाज का मिशन इस धरती से गरीबी, अन्याय और अज्ञान को मिटाना है। इसके अलावा, उन्होंने दस सिद्धांत स्थापित किए जिन्हें दस नियम या सिद्धांत कहा जाता है।

चार वेदों, सामवेद, ऋग्वेद, अथर्ववेद और यजुर्वेद ने समाज का मार्ग प्रशस्त किया। आर्य समाज एक ईश्वर में विश्वास करता है, जिसे "ओम" से जाना जाता है, जो सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सभी न्यायप्रिय और आनंदमय, बुद्धिमान और दयालु का स्रोत है। ये सभी अलग-अलग नामों को दर्शाते हैं जिनका एक पहलू ईश्वर है - एक सार्वभौमिक सत्य।

आर्य समाज की स्थापना - arya samaj ki sthapna kisne ki

आर्य समाज की स्थापना :- आर्य समाज की स्थापना 10 अप्रैल 1875 को राजा दयानंद सरस्वती जी द्वारा की गई थी। आर्य समाज एक सोशल रिफॉर्म मूवमेंट है जिसका मुख्य उद्देश्य वैदिक संस्कृति, संस्कारों, धर्म और ज्ञान को फैलाना था। यह एक प्रमुख आर्य संस्कृति और धर्म की प्रतिस्थापना की कोशिश थी।

arya samaj ki sthapna kisne ki
arya samaj ki sthapna kisne ki

आर्य समाज एक सामाजिक सुधार आंदोलन है जिसकी स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में की थी। इसका मुख्य उद्देश्य अन्याय, अंधविश्वास, अंधश्रद्धा और विपरीत विश्वासों से मुक्त समाज की रचना करना था। इस संगठन के सदस्यों का पक्ष-पात, जातिप्रथा और पुरानी पारंपरिक अनुचित अभ्यासों के प्रति विरोध था।

स्वामी दयानंद सरस्वती

स्वामी दयानंद सरस्वती आर्य समाज के संस्थापक हैं। स्वामी दयानंद सरस्वती का जन्म 12 फरवरी, 1824 को गुजरात के एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में श्री करशनजी लालजी तिवारी और श्रीमती यशोदाबाई के घर हुआ था।

महर्षि को 'आधुनिक भारत के निर्माताओं' में से एक माना जाता है। उनका जन्म नाम मूल शंकर तिवारी/त्रिवेदी है। उनके साहित्यिक कार्यों में सत्यार्थ प्रकाश (1875) शामिल हैं।

यह पुस्तक 20 से अधिक भाषाओं में प्रकाशित हुई थी, जिसमें संस्कृत और कुछ विदेशी भाषाएँ जैसे फ्रेंच, जर्मन, अरबी, अंग्रेजी, चीनी और स्वाहिली शामिल थीं।

स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विरजानंद दंडीशा के शिष्य थे और गुरु के रूप में उनका अनुसरण करते थे। 1846 से 1860 तक, स्वामी दयानंद सरस्वती पंद्रह वर्षों तक सन्यासी रहे।

स्वामी दयानंद सरस्वती एक भारतीय दार्शनिक और स्वयं-शिक्षित व्यक्ति थे जिनके पास भारत के लिए एक बहुत ही शक्तिशाली दृष्टिकोण था

आर्य समाज के 10 नियम

1. सब सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदिमूल परमेश्वर है।
2. ईश्वर सच्चिदानंदस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है, उसी की उपासना करने योग्य है।
3. वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढना – पढाना और सुनना – सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।
4. सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिये।
5. सब काम धर्मानुसार, अर्थात सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहियें।
6. संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है, अर्थात शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।
7. सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिये।
8. अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।
9. प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिये, किंतु सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये।
10. सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी, नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने सब स्वतंत्र रहें।

आर्य समाज का इतिहास _

आर्य समाज एक सामाजिक सुधार आंदोलन है जिसकी स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में की थी। इसका मुख्य उद्देश्य अन्याय, अंधविश्वास, अंधश्रद्धा और विपरीत विश्वासों से मुक्त समाज की रचना करना था। इस संगठन के सदस्यों का पक्ष-पात, जातिप्रथा और पुरानी पारंपरिक अनुचित अभ्यासों के प्रति विरोध था।

आर्य समाज की संस्था के नियमावली को वेदों पर आधारित ढांचे में तैयार किया गया था। इसके सदस्यों ने वेदों की पुरोहितों द्वारा विपरीत व्याख्याओं, आंध्रपण और चट्टानों वाले ब्राह्मणवाद के विरोध में लड़ाई लड़ी और वेदों का सही संदेश लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया।

उन्होंने महिला शिक्षा, वीधवा विवाह, बालविवाह, सती प्रथा और दासता के खिलाफ लड़ाई लड़ी और सामाजिक सुधार संघटित की। इसके सदस्यों ने आर्य समाज वालेट के संघ के गठन किए जिसके द्वारा मुस्लिमों की दक्षिणी पंजाब के अलगावर्ती भूभाग में अर्थव्यवस्था सुदारने का प्रयास किया गया।

आर्य समाज ने भारतीय स्वाधीनता संग्राम में भी अहम भूमिका निभाई। यह आंदोलन स्वामी श्रद्धानंद और स्वामी श्रद्धानंदम जैसे प्रमुख नेता के द्वारा आगे ले जाया गया। इस के बाद आर्य समाज में स्वतंत्रता-आंदोलन और महात्मा ग़ांधी के प्रभाव के बावजूद दारिद्राय निवारण, तरक्की करार, महिला शिक्षा, बालविवाह निवारण और ब्राह्मणवाद से लड़ाई आदि प्रमुख मुद्दों पर कार्य किया गया।

आज भारतीय समाज में भी आर्य समाज उपासना और सांस्कृती के महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। आर्य समाज के सदस्यों को आर्य समाजिय मान्यताओं का पालन करना पड़ता है और उन्हें आर्य समाज में रोजगार प्राप्त करने के लिए ही संघ किया जाता है।

निष्कर्ष

आर्य समाज का मानना था और इस बात पर बल दिया गया कि ईश्वर ही सही ज्ञान है। व्यक्ति के कर्म धर्म के अधीन हैं। आर्य समाज के माध्यम से राष्ट्र कल्याण में स्वामी दयानंद सरस्वती का योगदान अतुलनीय है।

हालाँकि उनकी हिंदू धर्म में गहरी आस्था थी, फिर भी उन्होंने बिना जाति और धार्मिक भेदभाव के लोगों की मदद की। उन्होंने राष्ट्र के लिए शिक्षा में व्यापक बदलाव लाने पर जोर दिया।

उनके दस सिद्धांतों की रूपरेखा आज की दुनिया के लिए महत्वपूर्ण है। जो आत्मज्ञान प्राप्त करते समय उन सिद्धांतों का पालन करता है।